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Tuesday, 14 October 2014

चार धाम यात्रा ( केदारनाथ धाम) 1

सुबह जल्दी उठ कर चलने की तेयारी शुरू हो गई।  सभी से वार्तालाप करने के बाद तय हुआ की केदार नाथ  जायेगे ।   जोशीमठ से  यात्रा शुरू की मंजिल थी । केदार नाथ धाम     केदारनाथ मन्दिर

केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया।

जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। मंदिर की दीवारें गिर गई और बाढ़ में बह गयी। इस ऐतिहासिक मन्दिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहे लेकिन मन्दिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया।
महिमा व इतिहास

केदारनाथ की बड़ी महिमा है . उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ - ये दो प्रधान तीर्थ हैं , दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है . केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है , उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर - नारायण - मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है .

इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है , पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है . राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये 12-13 वीं शताब्दी का है . ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो 1076-99 काल के थे . एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है . मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है , जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है . फिर भी इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल मानते है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं . 1882 के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं . " पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है . मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है . जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं . श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये . " केदारनाथ मन्दिर रुद्रप्रयाग जिले मे है उत्तरकाशी जिले मे नही  ।ये  बात हुए केदार नाथ की  बारिश होने लगी थी ।   तेज और तेज होती गई । पर हमारा करवा चलता गया  जवानी का जोश   पूरे शरीर  में हिलोरे  मार रहा था । तो बारिश के परवाह ना करते हुए   हम शाम तक  गोरी कुंड पहुच गए । बारिश लगातार हो रही थी । हम पूरी तरह से भीग गए थे।  गोरी कुंड तक की कार या बाइक जाती है ।   शाम हो चुकी थी होटल में कमरा लिया और  गीले कपड़ो को उतारा  और कम्बल में घुस गए। खाना खा कर जल्दी ही  नीद ने आ दबोचा ।   हमे सुबह पैदल यात्रा करनी थी  केदारं नाथ की  ।    19 km  पैदल यात्रा   बहुत कठिन  यात्रा है । अच्छे अच्छे  आदमी के कश बल   निकलने वाली यात्रा  है ऊपर से मोसम   की मार  बारिश पूरी रात होती रही  । अगली सुबह यात्रा का पाचवा दिन था ।   जल्दी ही सब उठ गए । क्योकि शाम तक वापस आना था गोरी कुंड ।   यात्रा बहुत कठिन थी जीवट वाला ही यहाँ की यात्रा कर सकता है । हम तो वेसे भी आलसी है । कुछ दूर चलते ही । अतुल भाई और शर्मा जी ने घोडा किराये पर कर लिया । कुछ देर अतुल भाई उस पर  सवारी करते और कुछ देर शर्मा जी  ।   अब हम रामबाड़ा पहुच गए थे । यहाँ कुछ दुकाने थी । यहाँ नास्ता किया और आगे की  यात्रा शुरू की। केदार नाथ से मंदाकनी नदी बहती है । मंदाकनी नदी अपने पुरे शवाब पर थी । अपने  पुरे वेग से  कल कल की आवाज के साथ  बह रही थी।  2 घंटे की यात्रा के बाद हमें केदार नाथ मंदिर के दर्शन हुए । यहाँ  कुछ होटल और पुजारी के  भवन थे । मंदिर के बहार नंदी की  की एक प्रतिमा है मानो  शिव की आराधना कर रही हो ।  मंदिर बहुत ही भव्य था  । हम चारो एकटक  कितनी देर तक मंदिर को निहारते रहे  ।   जितने भी कष्टों से यात्रा की थी । मंदिर को देखते ही  सारी थकान पल भर में दूर हो गई। मंदिर के दर्शन किये । कुछ फोटो ली  और कुछ देर आराम करने के बाद वापस  गोरी कुंड  को चल दिए ।  शाम 6 बजे तक वापस गोरी कुंड पहुच गए सही सलामत ।  कल गोरी कुंड नही घुमा था आज घूमना हुआ । यहाँ गरम पानी का एक स्रोत है । वहा   बहुत देर तक नहाये  सारी थकान  ख़तम हो गई । खाना खा कर जल्दी ही बिस्तर पकड़ लिया ।  अगली सुबह  यात्रा जो करनी थी गंगोत्री की   अगले भाग में जारी
 

चार धाम यात्रा " माना"

बद्रीनाथ  के दर्शन   करने के बाद   हम लोग  माना   गाँव जाना था ।मेने कितने शिलापट देखे थे  जिन पर माना गाँव  की दुरी अंकित होती थी ।  मुझे पता था की  वो   भारत का आखरी  गाँव था ।  दिन  2:30  बज चुके थे  वापस भी जाना था। आज का प्रोग्राम ओली रुकने का था। पर मुझे आभास हो चला था की किसी भी हालत में आज   जोशीमठ ही  नही  पहुच पायेगे।  माना गाँव के बीच में एक पहाड़ी नाला था ।  धारा तेज थी सडक भी टूटी हुई थी कहा सड़क है । ये पता  ही नही चल पा रहा था।  बड़ी मुश्किल से  उस बहाव को पार किया ।  तभी वहा पर एक फोजी भाई  दिखाई दिया ।  अतुल साहनी ने  फ़ौरन  फोजी भाई को देख कर  कहा  "भारत माता की जय"  फोजी भाई ने तुरंत अभिवादन का जवाब  दिया  ।  फोजी भाई का नाम   मंजीत सिंह था वो सरदार   था। मुछे    और दाड़ी एक दम   बोडर के सनी देओल की तरह थी ।रोबदार  चेहरा   लम्बाई  लगभग 5.11   थी।   जिस्म एक दम फिट था।  सर्दी थी पर उनको शायद सर्दी का एहसास नही हो रहा था ।उम्र कोई मेरे हिसाब से 29 के आस पास थी उनकी । और आवाज  के क्या कहने  शरीर के  हिसाब से मेल खाती  थी ।  सरदार जी बोले  " पुत्तर   कहा जा रहे हो"   हमने कहा पाजी "माना " जाना है कितनी दूर है अभी । उन्होंने कहा की पहुच  गए आप । तो सरदार जी से कुछ इधर उधर की बात हुई। और हम माना की  तरफ चल दिए ।  "माना" पहुच गए । बाइक  साइड लगाई  ।गाँव के बाहर   कुछ  दुकाने थी ।वहा से  कोल्ड ड्रिंक की  बोतल और बिस्कुट खरीदे। पहाड़ो का  क्या नज़ारा था । शांति थी वहा  एक अजीब सा सुकून  मिल रहा  था । वहा से  हम उपर एक हनुमान मंदिर है । उसको देखने के लिए हम  उपर की तरफ  चढ़ाई करने लगे । पर  कुछ दूर चलते ही   एसे हाफ ने लगे जेसे कोई मेराथन दोड़ लगाकर आये हो । ऑक्सीजन की भारी कमी महसूस  होने लगी ।  हम चारो  की हालत ख़राब थी   फेप्ड़े  वातावरण की  सारी हवा ही खीचने पर उतारू थे । हमारे हालत को देख क़र एक  महिला   जिसकी उम्र लगभग 50 साल तो पक्का होगी   हमारे पास आई । हम सभी  बुलडोग  कुत्तो की तरह हाफ रहे थे ।  उन महिला के हाथ में  सरसों के फूल की तरह कोई फूल था ।  उन्होंने कहा की   आप को इस को अजमाना चाहिए।  इस  आप को राहत मिलेगी । उस फूल को  उन्होंने  हम चारो के कान के  उपर रख दिया ।  मेने पहले सोचा की  इस फूल से क्या होगा  पर आप  अंदाजा नही लगा सकते । मे आश्चर्याचकित रह  गया ।   वो तरीका काम क़र रहा था । अब हम पहले से ज्यादा  अच्छा फील कर रहे थे । ये कमाल का फूल है उनसे नाम पूछा तो  उन्होंने बताया की बाबु जी  कुछ बातो को छुपा ही रहने दे तो अच्छा है । उन महिला का शुक्रिया अदा किया और  हनुमान मंदिर के दर्शन किये   फिर एक घुफा के दर्शन किये जहा  कहा जाता है की व्याश जी ने   रामायण लिखी थी  उसके कुछ आगे चलते ही  एक बोर्ड पर लिखा था  "भारत की आखरी चाय की दूकान "     वहा उस दूकान से आगे एक बड़ी पहाड़ था उसके आगे चीन का बोडर था । उस दूकान पर चाय पी 25 रूपए की एक चाय थी।   फोटो लिए और  वापस चल दिए । क्योकि हमे जाना था ओली ।  जोशीमठ पहुचने में 6 बज गए ।  बाइक भी ठीक करानी थी ।  जोशीमठ पहुच कर  एक मेकेनिक को बाइक दिखाई । उसने बाइक का कारबोरेटर  को साफ़ करा तो बाइक एक दम टिपटॉप हो गई।  इतने देर में अतुल  भाई   ओली के बारे में जानकारी जुटा लाये ।उन्होंने बताया की ओम भाई  रात को ओली नही जा सकते है।  मेने कहा क्यों क्या थक गए आप। तो उन्होंने जवाब दिया की   थका नही हु । ओली का रास्ता खतरे से खाली नही है इस वक़्त ।  क्योकि इस टाइम सड़क पर भालू आ जाते है । जगल का रास्ता है  ।    भलाई इसी में है की रात जोशीमठ में ही गुजारी जाये । सुबह देखेगे । मेरा मन था पर पर जान सब को प्यारी होती है।  मन को  समझाया और ओली जाने का ख़याल मन से किसी तरह निकाल दिया ।  रात उसी होटल में गुजारी      अगले भाग में जारी