आज तीसरा दिन था सुबह 4 बजे सबको उठाया में अपने आप को ही आलसी समझता था मेरे मित्र मेरे से भी ज्यादा आलसी थे सबको उठाया दिनचर्या से फरिक होकर 5 बजे हम बिना कुछ खाए पिये चल दिए मंजिल थी बद्रीनाथ में यहाँ आप को बता दू की जोशीमठ से रास्ता वनवे है यहाँ से 200 बाइक या कार को एक साथ यहाँ की पुलिस जाने देते है जब ये बाइक बद्रीनाथ पहुच जाती है तब वहा से ऐसे ही 200 व्हीकल को उधर से आने देते है । वहा एक बेरियर लगाया हुआ था ये 2005 की बात है शायद अब 2 लाइन हो गई होगी पता नही मेरे को पर जब ऐसे ही होता था । बेरियर के पास पहुचने पर पुलिस वालो ने रोका पर हम ने सोचा की पैसे मागने होगे मेने बाइक को रोका नही ये बाद में पता चला की वो क्यों रोक रहे थे । कोहरा पड़ रहा था ना होता तो अवश्य ही पकड़ लेते वो हम ख़ुशी के मारे फुले नही
समां रहे थे की केसे चकमा दे दिया आगे चले तो कल रात की बारिश की वजह से कितने पहाड़ अपनी जगह से सड़क पर गिर गए थे इस कारण ही वो हमें रोक रहे थे । पहाड़ का मलवा सड़क पर यहाँ वहा बिकरा पड़ा था और पहाड़ गिर भी रहे थे एक बार दिल में आया की वापस चले पर मेने ये बात किसी से नही कही पर शर्त लगा सकता हु की मेरे से ज्यादा उनकी हालत ख़राब हो रही थी पर कोई भी अपनी जबान से कहने को तेयार नही था की कही डरपोक ना समझ ले कोई एक तो कोहरा इतना ज्यादा ऊपर से कीचड़ में बाइक ऐसे चल रही थी जेसे कोई मतवाला दारू पी कर चला रहा हो जेसे उसकी बाइक में तेल की जगह दारू हो । बहुत सभाल कर बाइक चलाना पड़ रहा था । हमारे पीछे पहाड़ गिर रहे थे दिखाई तो नही दे रहे थे पर आवाज आ रही थी और पीछे बेठा दोस्त बार बार कह रहा था की ये गिरा वो गिरा मुझे भी पता था की वो सच बोल रहा है । पर में अपना डर उस पर जाहिर नही करना चाहता था मेने बाइक रोकी और उससे कहा की अगर मेरे साथ चलना है तो अपने इस मुह को बंद रखो वर्ना अतुल भाई के साथ बेठ जाओ वो चुप चाप मेरी तरफ देखता रहा बोला कुछ नही पर अवश्य ही मन ही मन गाली जरुर दे रहा होगा । पहाड़ से उतारते ही हालत कुछ ठीक हुए । 7 बज गए थे सूरज निकलने लगा था । अब हमको पता चला की हम कहा है एक रास्ता था रास्ता क्या सड़क का तो पता नही कितने नीचे थी पहाड़ का मलवा था उसी पर हम चले जा रहे थे । साइड में एक तरह पहाड़ और दूसरी तरफ अलकनंदा नदी कल कल की आवाज के साथ हमारे साथ चल रही थी काफी नीचे से आवाज आ रही थी बड़ी डरावनी आवाज अलकनन्दा के बारे में बाते चल ही रही है तो एक नज़र डाल ही लेते है
अलकनन्दा नदी गंगा की सहयोगी नदी हैं। यह गंगा के चार नामों में से एक है। चार धामों में गंगा के कई रूप और नाम हैं। गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है, केदारनाथ में मंदाकिनी और बद्रीनाथ में अलकनन्दा। यह उत्तराखंड में शतपथ और भगीरथ खड़क नामक हिमनदों से निकलती है। यह स्थान गंगोत्री कहलाता है। अलकनंदा नदी घाटी में लगभग २२९ किमी तक बहती है। देव प्रयाग या विष्णु प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और इसके बाद अलकनंदा नाम समाप्त होकर केवल गंगा नाम रह जाता है। अलकनंदा चमोली टेहरी और पौड़ी जिलों से होकर गुज़रती है।. गंगा के पानी में इसका योगदान भागीरथी से अधिक है। हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ अलखनंदा के तट पर ही बसा हुआ है। राफ्टिंग इत्यादि साहसिक नौका खेलों के लिए यह नदी बहुत लोकप्रिय है। तिब्बत की सीमा के पास केशवप्रयाग स्थान पर यह आधुनिक सरस्वती नदी से मिलती है। केशवप्रयाग बद्रीनाथ से कुछ ऊँचाई पर स्थित है।
गहराई
अलकनन्दा नदी कहीं बहुत गहरी, तो कहीं उथली है, नदी की औसत गहराई 5 फुट (1.3 मीटर), और अधिकतम गहराई 14 फीट (4.4 मीटर) है. । ये बात हुए नदी की अब बात करते है यात्रा की हम चले जा रहे थे वाहन ना हमारे पीछे था ।और ना ही आगे से आ रहा था शायद आगे रास्ता बंद था मेरे अनुमान से एक बात और हुई की अचानक बाइक बंद हो गई बहुत किक मारी पर बाइक ने कहा की स्टार्ट नही कर पाओगे त्यागी जी । अपनी मेकेनिक वाला दिमाक को लगाया और सोचा क्या हुआ होगा । सर्विस करा कर लाया था फिर आखिर क्या हुआ ऐसा दिमाक पर और जोर दिया तो पता चला की मेरा दोस्त जो शर्मा है । जो मेरे साथ था कल्लू वो शर्मा है जी की ऑटोमोबाइल की दुकान है ।उसने ही बाइक की सर्विस कराई थी । शायद स्पाक प्लग पुराना ही डलवा दिया हो । मेने पूछा तो उसने गुस्से में मेरी तरफ देख कर कहा की नया प्लग ही दिया था दूकान से खोल कर चेक करो। अभी मेने कहा भाई शर्मा जी बस पूछ रहा था । फिर ख्याल आया की शर्मा जी ने 2 लीटर तेल अपनी दूकान से डाला था बाइक में फ्यूल वो डिब्बा जिस में फ्यूल रखा था वो कार के कूलैंट का था शायद फ्यूल के साथ कूलैंट भी टंकी में गिर गया था । मेने प्लग को खोला और साफ़ कर के दुबारा लगाया तो महारानी तुरंत स्टार्ट हो गई जान में जान आई । अब सफ़र दोबारा से शुरू किया पहाड़ का नज़ारा दिल को बहुत अच्छा फील करा रहा था ।गुस्सा भी आ रहा था शर्मा जी के उपर की खुद नज़ारे देख रहे है और मै नोकर की तरह बाइक चला रहा हु कुछ दूर आगे चलकर बहुत सी कारे और बाइक आ रही है । बद्रीनाथ की तरफ से वनवे होने के कारण पास करने में बहुत कम जगह होने के कारण पहाड़ की साइड में चिपककर कार और बाइक वालो को जगह दी 20 min तक पहाड़ की दीवार से चिपके रहे हम चारो आगे चले तो राईट साइड में हेमकुंड साहेब आया सरदारों का एक पवित्र गुरुद्वारा है यहाँ झुककर सलाम किया और कुछ दुकाने थी वहा जहा से हेमकुंड साहेब को पैदल रास्ता जाता है । हेमकुण्ड साहिब
हेमकुंट साहिब चमोली ज़िला, उत्तराखंड, भारत में स्थित सिखों का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। भारत के निरीक्षण मुताबिक यह हिमालय पर्वतों में 4632 मीटर (15,200 फुट) की ऊँचाई पर एक बर्फ़ीली झील किनारे सात पहाड़ों के बीच बिराजमान है; इन सात पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं। इस तक रिशीकेश-बद्रीनाथ साँस-रास्ता पर पड़ते गोबिन्दघाट से सिर्फ़ पैदल चढ़ाई के द्वारा ही पहुँचा जा सकता है।
यहाँ गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब सुशोबत है। इस स्थान का जैसे गुरु गोबिंद सिंघ द्वारा लिखे गए दसम ग्रंथ में आता है; इस करके यह उन लोगों के लिए ख़ास महत्व रखता है जोदसम ग्रंथमें विश्वास रखते हैं। यहाँ कुछ देर रुके और चल दिए कीचड के कारण हालत ख़राब थी मेरी बाइक जो हीरो हौंडा पेसन थी न्यू थी पर उसको देखकर कोई बता नही सकता था । की ये न्यू है । बहुत मज़ा आ रहा था आगे चलकर चढाई सुरु होने लगी थी । बीच में एक मंदिर मिला रूककर माथा टेका और आगे चल दिए 11 बजने को को हो रहे थे । फिर महारानी मेरी बाइक ने झटके लेने शुरू कर दिए । एक तो चढ़ाई उपर से महारानी ने कह दिया की नही चलुगी एक बार फिर प्लग बदला भला हो मेरे दिमाक का एक प्लग पुराना अपने साथ रख लिया था उसको बदला कुछ आराम मिला पर झटके बंद नही हुए । शर्मा जी की अतुल जी के साथ उसके स्कूटर पर बेठा दिया अकेले ही बाइक चलाने लगा । अब पक्का यकीन हो चला था की प्रॉब्लम प्लग में नही काबोरेटर में है कचरा है उसमे इतना तो अपुन समझ ही सकता है। मेकेनिक जो था इसका नही पर मारुती का तो हु ही कर भी लेता ठीक पर ऒजार नही थे और टाइम भी नही था । आगे चले झटको की प्रॉब्लम आती गई अकेले होने की वजह से कम प्रॉब्लम हो रही थी तभी एक बड़ा सा गेट दिखाई दिया उसपर शायद ठीक से याद नही पर लिखा था । बद्रीनाथ में आप का स्वागत है । माना 4 km मीटर बद्रीनाथ 1 km पहुच गए । 12 बज गए थे बस स्टैंड पर बाइक लगाई मंदिर देखना था । पर उससे पहले हालत ठीक करनी थी । और उससे भी पहले जो चूहे पेट मे कूद रहे थे उसको भोजन करना था वर्ना उस हालत ऐसी हो रही थी की कुछ देर और रुकते तो वो चूहे को बिल्ली खाने वाली थी। होटल देखा खाना खाया 4 आलू के पराठे खाए और वही होटल पर बेग रखा और अपना एकमात्र रील वाला केमरा निकाल लिया । और चल दिए मंदिर के तरह एक छोटा सा पुल पार किया । मंदिर के दर्शन किये शर्मा जी ने एक फोटो ली अंदर उसको पता नही था की फोटो लेना मना है एक शोर सा हुआ और मंदिर के पुजारी ने केमरा को खीच कर अपने पास रख लिया और कहने लगा की अब नही मिलेगा कोई खीच रहा है यहाँ फोटो । अब हमे क्या पता मिन्नतें का दॊर चला काफी देर तक मिन्नतें की जब जाकर केमरा मिला । अब मंदिर से बाहर आकर बाइक को ठीक कराना था । दूकान तो मिल ही जाएगी पर मुसीबत तो हमारा साथ छोड़ने को कहा त्यार थी दुकान नही थी एक पिंचर वाले की दूकान थी उसने कहा की भाई स्पार्क प्लग है पुराना मेरे पास 100 रूपए में दुगा और अपने आप ही डालना होगा मरता क्या ना करता अंधे को क्या चाहिए तो आखे । भागते भुत का लगोट ही सही 100 रूपए में स्पार्क प्लग लिया लगाया महारानी मेरी बाइक ठीक हो गई पर झटके कम थे । अब जाना था इंडिया के आखरी गाँव माना वहा पीनी थी चाय। जी हा वहा है । भारत की आखरी चाय की दूकान और चाय भी 25 रूपए की । अगले भाग में जारी




