Monday, 28 October 2019
Wednesday, 23 October 2019
Tuesday, 14 October 2014
चार धाम यात्रा ( केदारनाथ धाम) 1
सुबह जल्दी उठ कर चलने की तेयारी शुरू हो गई। सभी से वार्तालाप करने के बाद तय हुआ की केदार नाथ जायेगे । जोशीमठ से यात्रा शुरू की मंजिल थी । केदार नाथ धाम केदारनाथ मन्दिर
केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया।
जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। मंदिर की दीवारें गिर गई और बाढ़ में बह गयी। इस ऐतिहासिक मन्दिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहे लेकिन मन्दिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया।
महिमा व इतिहास
केदारनाथ की बड़ी महिमा है . उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ - ये दो प्रधान तीर्थ हैं , दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है . केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है , उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर - नारायण - मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है .
इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है , पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है . राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये 12-13 वीं शताब्दी का है . ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो 1076-99 काल के थे . एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है . मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है , जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है . फिर भी इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल मानते है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं . 1882 के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं . " पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है . मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है . जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं . श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये . " केदारनाथ मन्दिर रुद्रप्रयाग जिले मे है उत्तरकाशी जिले मे नही ।ये बात हुए केदार नाथ की बारिश होने लगी थी । तेज और तेज होती गई । पर हमारा करवा चलता गया जवानी का जोश पूरे शरीर में हिलोरे मार रहा था । तो बारिश के परवाह ना करते हुए हम शाम तक गोरी कुंड पहुच गए । बारिश लगातार हो रही थी । हम पूरी तरह से भीग गए थे। गोरी कुंड तक की कार या बाइक जाती है । शाम हो चुकी थी होटल में कमरा लिया और गीले कपड़ो को उतारा और कम्बल में घुस गए। खाना खा कर जल्दी ही नीद ने आ दबोचा । हमे सुबह पैदल यात्रा करनी थी केदारं नाथ की । 19 km पैदल यात्रा बहुत कठिन यात्रा है । अच्छे अच्छे आदमी के कश बल निकलने वाली यात्रा है ऊपर से मोसम की मार बारिश पूरी रात होती रही । अगली सुबह यात्रा का पाचवा दिन था । जल्दी ही सब उठ गए । क्योकि शाम तक वापस आना था गोरी कुंड । यात्रा बहुत कठिन थी जीवट वाला ही यहाँ की यात्रा कर सकता है । हम तो वेसे भी आलसी है । कुछ दूर चलते ही । अतुल भाई और शर्मा जी ने घोडा किराये पर कर लिया । कुछ देर अतुल भाई उस पर सवारी करते और कुछ देर शर्मा जी । अब हम रामबाड़ा पहुच गए थे । यहाँ कुछ दुकाने थी । यहाँ नास्ता किया और आगे की यात्रा शुरू की। केदार नाथ से मंदाकनी नदी बहती है । मंदाकनी नदी अपने पुरे शवाब पर थी । अपने पुरे वेग से कल कल की आवाज के साथ बह रही थी। 2 घंटे की यात्रा के बाद हमें केदार नाथ मंदिर के दर्शन हुए । यहाँ कुछ होटल और पुजारी के भवन थे । मंदिर के बहार नंदी की की एक प्रतिमा है मानो शिव की आराधना कर रही हो । मंदिर बहुत ही भव्य था । हम चारो एकटक कितनी देर तक मंदिर को निहारते रहे । जितने भी कष्टों से यात्रा की थी । मंदिर को देखते ही सारी थकान पल भर में दूर हो गई। मंदिर के दर्शन किये । कुछ फोटो ली और कुछ देर आराम करने के बाद वापस गोरी कुंड को चल दिए । शाम 6 बजे तक वापस गोरी कुंड पहुच गए सही सलामत । कल गोरी कुंड नही घुमा था आज घूमना हुआ । यहाँ गरम पानी का एक स्रोत है । वहा बहुत देर तक नहाये सारी थकान ख़तम हो गई । खाना खा कर जल्दी ही बिस्तर पकड़ लिया । अगली सुबह यात्रा जो करनी थी गंगोत्री की अगले भाग में जारी
चार धाम यात्रा " माना"
बद्रीनाथ के दर्शन करने के बाद हम लोग माना गाँव जाना था ।मेने कितने शिलापट देखे थे जिन पर माना गाँव की दुरी अंकित होती थी । मुझे पता था की वो भारत का आखरी गाँव था । दिन 2:30 बज चुके थे वापस भी जाना था। आज का प्रोग्राम ओली रुकने का था। पर मुझे आभास हो चला था की किसी भी हालत में आज जोशीमठ ही नही पहुच पायेगे। माना गाँव के बीच में एक पहाड़ी नाला था । धारा तेज थी सडक भी टूटी हुई थी कहा सड़क है । ये पता ही नही चल पा रहा था। बड़ी मुश्किल से उस बहाव को पार किया । तभी वहा पर एक फोजी भाई दिखाई दिया । अतुल साहनी ने फ़ौरन फोजी भाई को देख कर कहा "भारत माता की जय" फोजी भाई ने तुरंत अभिवादन का जवाब दिया । फोजी भाई का नाम मंजीत सिंह था वो सरदार था। मुछे और दाड़ी एक दम बोडर के सनी देओल की तरह थी ।रोबदार चेहरा लम्बाई लगभग 5.11 थी। जिस्म एक दम फिट था। सर्दी थी पर उनको शायद सर्दी का एहसास नही हो रहा था ।उम्र कोई मेरे हिसाब से 29 के आस पास थी उनकी । और आवाज के क्या कहने शरीर के हिसाब से मेल खाती थी । सरदार जी बोले " पुत्तर कहा जा रहे हो" हमने कहा पाजी "माना " जाना है कितनी दूर है अभी । उन्होंने कहा की पहुच गए आप । तो सरदार जी से कुछ इधर उधर की बात हुई। और हम माना की तरफ चल दिए । "माना" पहुच गए । बाइक साइड लगाई ।गाँव के बाहर कुछ दुकाने थी ।वहा से कोल्ड ड्रिंक की बोतल और बिस्कुट खरीदे। पहाड़ो का क्या नज़ारा था । शांति थी वहा एक अजीब सा सुकून मिल रहा था । वहा से हम उपर एक हनुमान मंदिर है । उसको देखने के लिए हम उपर की तरफ चढ़ाई करने लगे । पर कुछ दूर चलते ही एसे हाफ ने लगे जेसे कोई मेराथन दोड़ लगाकर आये हो । ऑक्सीजन की भारी कमी महसूस होने लगी । हम चारो की हालत ख़राब थी फेप्ड़े वातावरण की सारी हवा ही खीचने पर उतारू थे । हमारे हालत को देख क़र एक महिला जिसकी उम्र लगभग 50 साल तो पक्का होगी हमारे पास आई । हम सभी बुलडोग कुत्तो की तरह हाफ रहे थे । उन महिला के हाथ में सरसों के फूल की तरह कोई फूल था । उन्होंने कहा की आप को इस को अजमाना चाहिए। इस आप को राहत मिलेगी । उस फूल को उन्होंने हम चारो के कान के उपर रख दिया । मेने पहले सोचा की इस फूल से क्या होगा पर आप अंदाजा नही लगा सकते । मे आश्चर्याचकित रह गया । वो तरीका काम क़र रहा था । अब हम पहले से ज्यादा अच्छा फील कर रहे थे । ये कमाल का फूल है उनसे नाम पूछा तो उन्होंने बताया की बाबु जी कुछ बातो को छुपा ही रहने दे तो अच्छा है । उन महिला का शुक्रिया अदा किया और हनुमान मंदिर के दर्शन किये फिर एक घुफा के दर्शन किये जहा कहा जाता है की व्याश जी ने रामायण लिखी थी उसके कुछ आगे चलते ही एक बोर्ड पर लिखा था "भारत की आखरी चाय की दूकान " वहा उस दूकान से आगे एक बड़ी पहाड़ था उसके आगे चीन का बोडर था । उस दूकान पर चाय पी 25 रूपए की एक चाय थी। फोटो लिए और वापस चल दिए । क्योकि हमे जाना था ओली । जोशीमठ पहुचने में 6 बज गए । बाइक भी ठीक करानी थी । जोशीमठ पहुच कर एक मेकेनिक को बाइक दिखाई । उसने बाइक का कारबोरेटर को साफ़ करा तो बाइक एक दम टिपटॉप हो गई। इतने देर में अतुल भाई ओली के बारे में जानकारी जुटा लाये ।उन्होंने बताया की ओम भाई रात को ओली नही जा सकते है। मेने कहा क्यों क्या थक गए आप। तो उन्होंने जवाब दिया की थका नही हु । ओली का रास्ता खतरे से खाली नही है इस वक़्त । क्योकि इस टाइम सड़क पर भालू आ जाते है । जगल का रास्ता है । भलाई इसी में है की रात जोशीमठ में ही गुजारी जाये । सुबह देखेगे । मेरा मन था पर पर जान सब को प्यारी होती है। मन को समझाया और ओली जाने का ख़याल मन से किसी तरह निकाल दिया । रात उसी होटल में गुजारी अगले भाग में जारी
Monday, 13 October 2014
चार धाम यात्रा
आज तीसरा दिन था सुबह 4 बजे सबको उठाया में अपने आप को ही आलसी समझता था मेरे मित्र मेरे से भी ज्यादा आलसी थे सबको उठाया दिनचर्या से फरिक होकर 5 बजे हम बिना कुछ खाए पिये चल दिए मंजिल थी बद्रीनाथ में यहाँ आप को बता दू की जोशीमठ से रास्ता वनवे है यहाँ से 200 बाइक या कार को एक साथ यहाँ की पुलिस जाने देते है जब ये बाइक बद्रीनाथ पहुच जाती है तब वहा से ऐसे ही 200 व्हीकल को उधर से आने देते है । वहा एक बेरियर लगाया हुआ था ये 2005 की बात है शायद अब 2 लाइन हो गई होगी पता नही मेरे को पर जब ऐसे ही होता था । बेरियर के पास पहुचने पर पुलिस वालो ने रोका पर हम ने सोचा की पैसे मागने होगे मेने बाइक को रोका नही ये बाद में पता चला की वो क्यों रोक रहे थे । कोहरा पड़ रहा था ना होता तो अवश्य ही पकड़ लेते वो हम ख़ुशी के मारे फुले नही
समां रहे थे की केसे चकमा दे दिया आगे चले तो कल रात की बारिश की वजह से कितने पहाड़ अपनी जगह से सड़क पर गिर गए थे इस कारण ही वो हमें रोक रहे थे । पहाड़ का मलवा सड़क पर यहाँ वहा बिकरा पड़ा था और पहाड़ गिर भी रहे थे एक बार दिल में आया की वापस चले पर मेने ये बात किसी से नही कही पर शर्त लगा सकता हु की मेरे से ज्यादा उनकी हालत ख़राब हो रही थी पर कोई भी अपनी जबान से कहने को तेयार नही था की कही डरपोक ना समझ ले कोई एक तो कोहरा इतना ज्यादा ऊपर से कीचड़ में बाइक ऐसे चल रही थी जेसे कोई मतवाला दारू पी कर चला रहा हो जेसे उसकी बाइक में तेल की जगह दारू हो । बहुत सभाल कर बाइक चलाना पड़ रहा था । हमारे पीछे पहाड़ गिर रहे थे दिखाई तो नही दे रहे थे पर आवाज आ रही थी और पीछे बेठा दोस्त बार बार कह रहा था की ये गिरा वो गिरा मुझे भी पता था की वो सच बोल रहा है । पर में अपना डर उस पर जाहिर नही करना चाहता था मेने बाइक रोकी और उससे कहा की अगर मेरे साथ चलना है तो अपने इस मुह को बंद रखो वर्ना अतुल भाई के साथ बेठ जाओ वो चुप चाप मेरी तरफ देखता रहा बोला कुछ नही पर अवश्य ही मन ही मन गाली जरुर दे रहा होगा । पहाड़ से उतारते ही हालत कुछ ठीक हुए । 7 बज गए थे सूरज निकलने लगा था । अब हमको पता चला की हम कहा है एक रास्ता था रास्ता क्या सड़क का तो पता नही कितने नीचे थी पहाड़ का मलवा था उसी पर हम चले जा रहे थे । साइड में एक तरह पहाड़ और दूसरी तरफ अलकनंदा नदी कल कल की आवाज के साथ हमारे साथ चल रही थी काफी नीचे से आवाज आ रही थी बड़ी डरावनी आवाज अलकनन्दा के बारे में बाते चल ही रही है तो एक नज़र डाल ही लेते है
अलकनन्दा नदी गंगा की सहयोगी नदी हैं। यह गंगा के चार नामों में से एक है। चार धामों में गंगा के कई रूप और नाम हैं। गंगोत्री में गंगा को भागीरथी के नाम से जाना जाता है, केदारनाथ में मंदाकिनी और बद्रीनाथ में अलकनन्दा। यह उत्तराखंड में शतपथ और भगीरथ खड़क नामक हिमनदों से निकलती है। यह स्थान गंगोत्री कहलाता है। अलकनंदा नदी घाटी में लगभग २२९ किमी तक बहती है। देव प्रयाग या विष्णु प्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और इसके बाद अलकनंदा नाम समाप्त होकर केवल गंगा नाम रह जाता है। अलकनंदा चमोली टेहरी और पौड़ी जिलों से होकर गुज़रती है।. गंगा के पानी में इसका योगदान भागीरथी से अधिक है। हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ अलखनंदा के तट पर ही बसा हुआ है। राफ्टिंग इत्यादि साहसिक नौका खेलों के लिए यह नदी बहुत लोकप्रिय है। तिब्बत की सीमा के पास केशवप्रयाग स्थान पर यह आधुनिक सरस्वती नदी से मिलती है। केशवप्रयाग बद्रीनाथ से कुछ ऊँचाई पर स्थित है।
गहराई
अलकनन्दा नदी कहीं बहुत गहरी, तो कहीं उथली है, नदी की औसत गहराई 5 फुट (1.3 मीटर), और अधिकतम गहराई 14 फीट (4.4 मीटर) है. । ये बात हुए नदी की अब बात करते है यात्रा की हम चले जा रहे थे वाहन ना हमारे पीछे था ।और ना ही आगे से आ रहा था शायद आगे रास्ता बंद था मेरे अनुमान से एक बात और हुई की अचानक बाइक बंद हो गई बहुत किक मारी पर बाइक ने कहा की स्टार्ट नही कर पाओगे त्यागी जी । अपनी मेकेनिक वाला दिमाक को लगाया और सोचा क्या हुआ होगा । सर्विस करा कर लाया था फिर आखिर क्या हुआ ऐसा दिमाक पर और जोर दिया तो पता चला की मेरा दोस्त जो शर्मा है । जो मेरे साथ था कल्लू वो शर्मा है जी की ऑटोमोबाइल की दुकान है ।उसने ही बाइक की सर्विस कराई थी । शायद स्पाक प्लग पुराना ही डलवा दिया हो । मेने पूछा तो उसने गुस्से में मेरी तरफ देख कर कहा की नया प्लग ही दिया था दूकान से खोल कर चेक करो। अभी मेने कहा भाई शर्मा जी बस पूछ रहा था । फिर ख्याल आया की शर्मा जी ने 2 लीटर तेल अपनी दूकान से डाला था बाइक में फ्यूल वो डिब्बा जिस में फ्यूल रखा था वो कार के कूलैंट का था शायद फ्यूल के साथ कूलैंट भी टंकी में गिर गया था । मेने प्लग को खोला और साफ़ कर के दुबारा लगाया तो महारानी तुरंत स्टार्ट हो गई जान में जान आई । अब सफ़र दोबारा से शुरू किया पहाड़ का नज़ारा दिल को बहुत अच्छा फील करा रहा था ।गुस्सा भी आ रहा था शर्मा जी के उपर की खुद नज़ारे देख रहे है और मै नोकर की तरह बाइक चला रहा हु कुछ दूर आगे चलकर बहुत सी कारे और बाइक आ रही है । बद्रीनाथ की तरफ से वनवे होने के कारण पास करने में बहुत कम जगह होने के कारण पहाड़ की साइड में चिपककर कार और बाइक वालो को जगह दी 20 min तक पहाड़ की दीवार से चिपके रहे हम चारो आगे चले तो राईट साइड में हेमकुंड साहेब आया सरदारों का एक पवित्र गुरुद्वारा है यहाँ झुककर सलाम किया और कुछ दुकाने थी वहा जहा से हेमकुंड साहेब को पैदल रास्ता जाता है । हेमकुण्ड साहिब
हेमकुंट साहिब चमोली ज़िला, उत्तराखंड, भारत में स्थित सिखों का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। भारत के निरीक्षण मुताबिक यह हिमालय पर्वतों में 4632 मीटर (15,200 फुट) की ऊँचाई पर एक बर्फ़ीली झील किनारे सात पहाड़ों के बीच बिराजमान है; इन सात पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं। इस तक रिशीकेश-बद्रीनाथ साँस-रास्ता पर पड़ते गोबिन्दघाट से सिर्फ़ पैदल चढ़ाई के द्वारा ही पहुँचा जा सकता है।
यहाँ गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब सुशोबत है। इस स्थान का जैसे गुरु गोबिंद सिंघ द्वारा लिखे गए दसम ग्रंथ में आता है; इस करके यह उन लोगों के लिए ख़ास महत्व रखता है जोदसम ग्रंथमें विश्वास रखते हैं। यहाँ कुछ देर रुके और चल दिए कीचड के कारण हालत ख़राब थी मेरी बाइक जो हीरो हौंडा पेसन थी न्यू थी पर उसको देखकर कोई बता नही सकता था । की ये न्यू है । बहुत मज़ा आ रहा था आगे चलकर चढाई सुरु होने लगी थी । बीच में एक मंदिर मिला रूककर माथा टेका और आगे चल दिए 11 बजने को को हो रहे थे । फिर महारानी मेरी बाइक ने झटके लेने शुरू कर दिए । एक तो चढ़ाई उपर से महारानी ने कह दिया की नही चलुगी एक बार फिर प्लग बदला भला हो मेरे दिमाक का एक प्लग पुराना अपने साथ रख लिया था उसको बदला कुछ आराम मिला पर झटके बंद नही हुए । शर्मा जी की अतुल जी के साथ उसके स्कूटर पर बेठा दिया अकेले ही बाइक चलाने लगा । अब पक्का यकीन हो चला था की प्रॉब्लम प्लग में नही काबोरेटर में है कचरा है उसमे इतना तो अपुन समझ ही सकता है। मेकेनिक जो था इसका नही पर मारुती का तो हु ही कर भी लेता ठीक पर ऒजार नही थे और टाइम भी नही था । आगे चले झटको की प्रॉब्लम आती गई अकेले होने की वजह से कम प्रॉब्लम हो रही थी तभी एक बड़ा सा गेट दिखाई दिया उसपर शायद ठीक से याद नही पर लिखा था । बद्रीनाथ में आप का स्वागत है । माना 4 km मीटर बद्रीनाथ 1 km पहुच गए । 12 बज गए थे बस स्टैंड पर बाइक लगाई मंदिर देखना था । पर उससे पहले हालत ठीक करनी थी । और उससे भी पहले जो चूहे पेट मे कूद रहे थे उसको भोजन करना था वर्ना उस हालत ऐसी हो रही थी की कुछ देर और रुकते तो वो चूहे को बिल्ली खाने वाली थी। होटल देखा खाना खाया 4 आलू के पराठे खाए और वही होटल पर बेग रखा और अपना एकमात्र रील वाला केमरा निकाल लिया । और चल दिए मंदिर के तरह एक छोटा सा पुल पार किया । मंदिर के दर्शन किये शर्मा जी ने एक फोटो ली अंदर उसको पता नही था की फोटो लेना मना है एक शोर सा हुआ और मंदिर के पुजारी ने केमरा को खीच कर अपने पास रख लिया और कहने लगा की अब नही मिलेगा कोई खीच रहा है यहाँ फोटो । अब हमे क्या पता मिन्नतें का दॊर चला काफी देर तक मिन्नतें की जब जाकर केमरा मिला । अब मंदिर से बाहर आकर बाइक को ठीक कराना था । दूकान तो मिल ही जाएगी पर मुसीबत तो हमारा साथ छोड़ने को कहा त्यार थी दुकान नही थी एक पिंचर वाले की दूकान थी उसने कहा की भाई स्पार्क प्लग है पुराना मेरे पास 100 रूपए में दुगा और अपने आप ही डालना होगा मरता क्या ना करता अंधे को क्या चाहिए तो आखे । भागते भुत का लगोट ही सही 100 रूपए में स्पार्क प्लग लिया लगाया महारानी मेरी बाइक ठीक हो गई पर झटके कम थे । अब जाना था इंडिया के आखरी गाँव माना वहा पीनी थी चाय। जी हा वहा है । भारत की आखरी चाय की दूकान और चाय भी 25 रूपए की । अगले भाग में जारी
Sunday, 12 October 2014
चार धाम यात्रा
मोसम बहुत सुहाना था हम चलते जा रहे थे साप की तरह बल खाती सड़क थी अतुल भाई अपने साथ एक अलग से एक एक्स्ट्रा टायर लाये थे रिम के साथ शायद किसी दोस्त की माग कर मै मन ही मन सोच रहा था की अगर मेरी बाइक मै पिंचर हो गया तो क्या करेगे रह रह कर ये चिंता सताए जा रही थी मेरे को अगर पिंचर हो गया तो गए उस टाइम दिमाक ने कहा की जहा भी जाओ पूरी तेयारी के साथ जाओ पर अब क्या हो सकता था जो होना था जो करना था हो चूका था में मन ही मन अपने दिल को दिलासा देता रहा पर अतुल भाई पर गुस्सा भी आ रहा था की मेने उनसे कहा था की हवा का एक पंप साथ ले लेना पर जल्दी मै कुछ याद नही रहा ! खेर जेसे होगा ठीक ही होगा इतना सोच ही रहा था की एक फट की आवाज आई मेने सोचा लो भाई गया टायर रुक कर टायर देखा वो सही सलामत था फिर मुंडी पीछे की तो पाया अतुल जी का स्कूटर रुका हुआ था रजनी घनदा का पीप सड़क पर धूक कर अपने दात दिखा कर खिसानी हँसी हँसते हए बोले ओम भाई पिंचर हो गया उनको हँसता हुआ देख कर मुझे अंदाजा हो गया था की वो अपने आप से तो टायर बदलने से रहे मेरे दिल पर बिजली सी गिर रही थी गुस्सा भी आ रहा था पर अब शाम ढलने लगी थी तो मेने ही ओज़ार लेकर लग गया टायर बदलने शाम हो चली थी पहाड़ो पर रात जल्दी ही हो जाती है उजाला था पर टायर बदलते बदलते अँधेरा हो चला खेर किसी तरह यात्रा फिर सुरु हई 6 बजे हम जोशीमठ पहुच चुके थे भगवान का शुक्रिया अदा किया और ठीक से पहुच गए पर हमे क्या पता था की मुसीबत की तो ये शुरुवात भर है । आगे अभी और मुसीबत हमारा इन्तजार कर रही थी । जोशीमठ पहुच कर होटल लिया मोसम ख़राब हो गया था हलकी हलकी बुदा बादी शुरू हो गई थी ठण्ड थी गर्म कपड़े थे हमारे पास तो पहन लिए और कल के बारे मै योजना बनाने लगे कमरे मै बैठकर की कल क्या करना है किसी से पूछा की बद्रीनाथ कितनी दूर है एक दूकान वाले ने बताया की70 km है यहाँ से यही से एक रास्ता ओली के लिए जाता है 13 या 15 km है ओली जहा मेने सुना था की बहुत बर्फ बारी होती है वहा तो और जोशीमठ से ही रोपवे भी जाता है ऐसा सुना सच है या झूठ पता नही उसके बारे मै कल सोचेगे जाना है या नही प्लान ये बना की कल बद्रीनाथ जायेगे वहा से माना जो की 3 km है वहा जायेगे माना इण्डिया का आखरी गाँव है उसके बाद से चीन की सीमा शुरू हो जाती है माना से वापस जोशीमठ और वहा से ओली जायेगे रात को वहा ही रुकेगे । पर कहते है न की जो मनुष्य सोचे अगर ऐसा हो जाये तो उससे बड़ा कोई नही हो सकता है पर कल मुसीबत हमारा बेशब्री से हसीना की तरह इन्तजार कर रही थी न जाने कब से हमारी राह तक रही थी मानो कह रही थी आ जाओ सनम कब से इन्तजार कर रही हु आप का रात के 11 बजे अतुल भाई सो गए अगली सुबह 4 बजे चलने के लिए। ........ अगले भाग में जारी